पराया



आज इस कदर मैं परेशान नज़र आता हूँ,
औरो से नहीं बनिस्पत खुद से खफा नज़र आता हूँ।
जिन अपनों को माना ज़िन्दगी का सबब,
आज उन् अपनों को मैं पराया नज़र आता हूँ।

जिनं से बेबाक कर लिया करता था हर सोच बया,
बिना शिकवा जो देते थे तवज्जो मुझको।
की ना जाने कौन सी बात अखर जाए उनको,
आज हर अलफ़ाज़ मैं सहमा सा कह पाता हूँ।
जिन अपनों को माना ज़िन्दगी का सबब,
आज उन् अपनों को मैं पराया नज़र आता हूँ।

ऐसा नहीं की मैं बदल गया हु अब,
की आज भी वोह मुझे उतने ही अज़ीज़ है।
पर ना जाने उन्हें क्यों लगता है हर बार,
की मैं अपने नहीं, सुनी सुनाई बातें दोहराता हूँ।
जिन अपनों को माना ज़िन्दगी का सबब,
आज उन् अपनों को मैं पराया नज़र आता हूँ।

की जब तक रहेगा पर्दा यही बेरुखी का,
और होंगी मुलाकातें कुछ यु की रस्मे हो जैसे।
लबो पर मुस्कराहट भले ही क़याम रखने में हो कमियाब,
आँखों की वीरानियों को देखते है कब तक छुपा पाता हूँ।
जिन अपनों को माना ज़िन्दगी का सबब,
आज उन् अपनों को मैं पराया नज़र आता हूँ।

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